पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जिस तरह से राजनीति में आकस्मिक प्रवेश किया। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन की यात्रा भी राजनीति में कुछ अप्रत्याशित रही है। वास्तव में, हेमंत राजनीति के बारे में तब गंभीर हो जब बड़े भाई दुर्गा सोरेन की असामयिक मृत्यु हो गयी और उनके पिता शिबू सोरेन का भी खराब स्वास्थ्य चल रहा था । हेमंत सोरेन, 10 अगस्त 1975 को पैदा हुए,वे एक इंजीनियरिंग ड्रॉप आउट हैं।

हेमंत सोरेन का राजनीति में प्रवेश 2009 में हुआ। कुछ महीने बाद, वे राज्यसभा सांसद बने। हालांकि, वह जनवरी 2010 तक राज्यसभा सांसद रहे और उसके बाद उन्होंने झारखंड में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में डिप्टी सीएम बनने के लिए इस्तीफा दे दिया। झामुमो इस सरकार में सहयोगी पार्टी थी। हालांकि, दो साल बाद 2012 में ही बीजेपी और झामुमो के बीच रिश्ते में दरार आ गई और आखिरकार जनवरी 2013 में अर्जुन मुंडा की सरकार गिर गई। सरकार गिरने के बाद झारखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।

इस दौरान हेमंत सोरेन का असली कद राजनीति में तब दिखाई दिया, जब उन्होंने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से बात करना शुरू किया। हालाँकि, कांग्रेस तैयार नहीं थी और झारखंड राष्ट्रपति शासन में आ गया। जिस पर उनकी पार्टी के भीतर हेमंत सोरेन की कड़ी आलोचना हुई। लेकिन हेमंत की इस आलोचना से घबराए नही और वह राज्य की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में लगे रहे।

इसका फायदा भी हुआ और 6 महीने बाद हेमंत सोरेन कांग्रेस और राजद के समर्थन से सत्ता में लौटे और जुलाई 2013 में हेमंत सोरेन पहली बार झारखंड के सीएम चुने गए। उनकी सरकार लगभग डेढ़ साल तक सत्ता में रही।

2014 के विधानसभा चुनावों में मोदी लहर थी और इस वजह से भाजपा एक बार फिर सत्ता में लौटी। हालांकि, हेमंत सोरेन ने विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में सरकार को घेरना जारी रखा। इसके साथ ही उन्होंने जनता के बीच भी अपनी पकड़ बनाए रखी। उनके प्रयासों का प्रभाव था कि हेमंत सोरेन का जादू एक बार फिर 2019 के विधानसभा चुनावों में आया और कांग्रेस और राजद के साथ उनकी पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया।

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