Mundeshwari Temple Kaimur – माँ मुंडेश्वरी धाम

मुंडेश्वरी मंदिर कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर परिसर में कई ऐसे शिलालेख विद्यमान है जिससे इस मंदिर की ऐतिहासिक होने की प्रमाणिकता मिलती है . यह मंदिर पुरातात्विक धरोहर के साथ साथ भारतीय कला , संस्कृति एवं अध्यात्म का प्रमुख केंद्र है . यह मंदिर पूर्वी भारत के कला केन्द्रों में से एक है जो बिहार के कैमूर जिला मुख्यालय भभुआ से लगभग 11 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित है .

कैसे पहुंचे मुंडेश्वरी धाम 

मुंडेश्वरी मंदिर पहुचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भभुआ रोड स्टेशन है . भभुआ रोड स्टेशन उतर कर आप सवारी गाड़ी से भभुआ मुख्यालय पहुच सकते है और उसके बाद भगवानपुर से होते हुए मुंडेश्वरी धाम जाने का रास्ता है . इसके आलावा आप भभुआ – चैनपुर पथ पर मोकरी गेट से दक्षिण होकर भी मुंडेश्वरी धाम पहुँच सकते है . मुंडेश्वरी धाम तक पहुचने के लिए पहाड़ी को काटकर सीढियों और रेलिंग युक्त सड़क बनायीं गयी है .

अनूठी वास्तुकला 

इस मंदिर की वास्तु अपने आप में अनूठी है . मंदिर बाहर  से अष्टफलकीय है . चारों दिशओं में द्वार है और चार कोणों में ताखे बने हुए है .दरवाजों पर द्वारपाल और देवी-देवता बने हुए हैं. बीच में चार स्तंभों के ऊपर मंदिर की सपाट छत टिकी हुई है.   पाखों पर सुंदर आकृतियां, तो चौखटबेल- बूटों से अलंकृत हैं. बाहरी भाग में उभरे हुए अंशों, विभाजित क्षैतिज लहरों के अतिरिक्त आलों, स्तंभों, छज्जों, घट, बेलों तथा गवाक्षतोरण अलंकरणों से इस मंदिर को शोभित किया गया है. मंदिर का बाहरी व्यास 40 फीट तथा भीतरी व्यास 20 फीट है.

अनेक प्रकार की मूर्तियाँ 

उत्तरी द्वार पुरातत्व विभाग के द्वारा बंद कर वहां छोटी छोटी मूर्तियों के साथ गणेश जी की प्रतिमा रख दी गयी है . वर्तमान में श्रधालुओ के लिए दक्षिणी और पश्चिमी द्वार ही खुले है . पूर्वी द्वार के पास पत्थरे का एक भांड रखा हुआ है जो सम्भवतः अन्न रखने के लिए बनाया गया होगा .पूर्वी द्वार के गलियारे में मां मुंडेश्वरी महिष पर आरूढ़ वाराही के रूप में स्थापित हैं. पश्चिमी दरवाजे के बाहर नंदी हैं. मंदिर के आस-पास से कलश-अमालक, विखंडित मूर्तियां, कलाकृतियां तथा स्तंभ मिले हैं. इसमें शिव-पार्वती, गणेश, महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा, सूर्य, कार्तिकेय आदि प्रमुख हैं.

भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग

द्वारो से प्रवेश करने पर मंदिर के अन्दर आयताकार स्थान है .मंदिर का शिखर पूर्ण रूप से ध्वस्त हो चूका है , जिसका अवशेष भी इतना खंडित हो चूका है की उसके आधार पर शिखर की कल्पना करना शायद संभव नहीं है . मुंडेश्वरी मंदिर में भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है जिसके बारे में यह कहा जाता है की इसका रंग सुबह , दोपहर और शाम को अलग अलग दिखाई देता है .

भारत के पुराने मंदिरों में से एक 

मुंडेश्वरी मंदिर को कब किसने बनाया ,इसके बारे में विभिन्न विद्वानों के बिच मतभेद है . कुछ विद्वान इस मंदिर को 635-36 ईस्वी का मानते है, तो कुछ चौथी सदी का मानते हैं. बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद् के प्रशासक आचार्य किशोर कुणाल ने विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर इसकी तिथि 108 ईस्वी बताई है. के.सी. पाणिग्रही के अनुसार इस मंदिर ने धार्मिक इतिहास के तीन काल खंडों में बिभाजित किया है. यह मंदिर प्रारंभिक गुप्तकाल यानी चौथी सदी में भगवान नारायण के  मंदिर के रूप में विद्यमान था. बाद में इसमें सूर्य का समावेश हुआ जिससे यह मंदिर नारायण देवकुल का हो गया.

प्राप्त शिलालेख के कुछ टुकड़े कोलकाता में मौजूद

गुप्तकाल के अंतिम चरण में इस मंदिर में शिव, गणेश व शक्ति (पार्वती तथा दुर्गा) की भी  पूजा होने लगी जिससे  यह मंदिर पंचायतन मंदिरों की श्रेणी में आ गया. अब यह एक देव समूह (निकाय) बन गया. बाद में हर्ष के समय इसमें विनितेश्वर शिव के इस (वर्तमान) मंदिर का समावेश हुआ. अंत में यहां देवी मुंडेश्वरी की स्थापना की गई. स्थानीय किंवदंती के अनुसार यहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित गढ़वटके चेरो राजा मुंड ने मुंडेश्वरी की स्थापना की थीं. बता दें कि यहाँ से प्राप्त शिलालेख के कुछ टुकड़े भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में मौजूद है.

शक्तिपीठ में से एक 

माँ मुंडेश्वरी मंदिर देश के शक्तिपीठों में से एक है . मार्कंडेय पुराण के अनुसार उस समय यहाँ पर एक अत्याचारी असुर मुंड रहता था . वो असुर आस पास के लोगों को परेशान करता रहता था . माँ भगवती ने जब उस राक्षस का अंत किया तब से इस मंदिर का नाम मुंडेश्वरी पड़ गया

 

Credit – Rohtas District

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